दुनिया का इतिहास पूछता : अटल बिहारी वाजपेयी
दुनिया का इतिहास पूछता,रोम कहाँ, यूनान कहाँ?
घर-घर में शुभ अग्नि जलाता।
वह उन्नत ईरान कहाँ है?
दीप बुझे पश्चिमी गगन के,
व्याप्त हुआ बर्बर अंधियारा,
किन्तु चीर कर तम की छाती,
चमका हिन्दुस्तान हमारा।
शत-शत आघातों को सहकर,
जीवित हिन्दुस्तान हमारा।
जग के मस्तक पर रोली सा,
शोभित हिन्दुस्तान हमारा।
भारत जमीन का टुकड़ा नहीं : अटल बिहारी वाजपेयी
भारत जमीन का टुकड़ा नहीं,
जीता जागता राष्ट्रपुरुष है।
हिमालय मस्तक है, कश्मीर किरीट है,
पंजाब और बंगाल दो विशाल कंधे हैं।
पूर्वी और पश्चिमी घाट दो विशाल जंघायें हैं।
कन्याकुमारी इसके चरण हैं, सागर इसके पग पखारता है।
यह चन्दन की भूमि है, अभिनन्दन की भूमि है,
यह तर्पण की भूमि है, यह अर्पण की भूमि है।
इसका कंकर-कंकर शंकर है,
इसका बिन्दु-बिन्दु गंगाजल है।
हम जियेंगे तो इसके लिये
मरेंगे तो इसके लिये।
मौत से ठन गई : अटल बिहारी वाजपेयी
ठन गई!
मौत से ठन गई!
जूझने का मेरा इरादा न था,
मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,
रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,
यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई।
मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं,
ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं।
मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ,
लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूँ?
तू दबे पाँव, चोरी-छिपे से न आ,
सामने वार कर फिर मुझे आज़मा।
मौत से बेख़बर, ज़िन्दगी का सफ़र,
शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर।
बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,
दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं।
प्यार इतना परायों से मुझको मिला,
न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला।
हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये,
आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए।
आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है,
नाव भँवरों की बाँहों में मेहमान है।
पार पाने का क़ायम मगर हौसला,
देख तेवर तूफ़ाँ का, तेवरी तन गई।
मौत से ठन गई।
क़दम मिला कर चलना होगा : अटल बिहारी वाजपेयी
बाधाएँ आती हैं आएँ
घिरें प्रलय की घोर घटाएँ,
पावों के नीचे अंगारे,
सिर पर बरसें यदि ज्वालाएँ,
निज हाथों में हँसते-हँसते,
आग लगाकर जलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।
हास्य-रूदन में, तूफ़ानों में,
अगर असंख्यक बलिदानों में,
उद्यानों में, वीरानों में,
अपमानों में, सम्मानों में,
उन्नत मस्तक, उभरा सीना,
पीड़ाओं में पलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।
उजियारे में, अंधकार में,
कल कहार में, बीच धार में,
घोर घृणा में, पूत प्यार में,
क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में,
जीवन के शत-शत आकर्षक,
अरमानों को ढलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।
सम्मुख फैला अगर ध्येय पथ,
प्रगति चिरंतन कैसा इति अब,
सुस्मित हर्षित कैसा श्रम श्लथ,
असफल, सफल समान मनोरथ,
सब कुछ देकर कुछ न मांगते,
पावस बनकर ढ़लना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।
कुछ काँटों से सज्जित जीवन,
प्रखर प्यार से वंचित यौवन,
नीरवता से मुखरित मधुबन,
परहित अर्पित अपना तन-मन,
जीवन को शत-शत आहुति में,
जलना होगा, गलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।
ठोकरें ज़हर नहीं हैं कि मैं खा भी न सकूँ...
अजनबी ख्वाहिशें सीने में दबा भी न सकूँ
ऐसे जिद्दी हैं परिन्दें कि उड़ा भी न सकूँ
फूँक डालूँगा किसी रोज़ मैं दिल की दुनिया
ये तेरा ख़त तो नहीं है कि जला भी न सकूँ
मेरी ग़ैरत भी कोई शय है कि महफ़िल में मुझे
उसने इस तरह बुलाया कि मैं जा भी न सकूँ
इक न इक रोज़ कहीं ढूंढ ही लूँगा तुझको
ठोकरें ज़हर नहीं हैं कि मैं खा भी न सकूँ...
मकान चाहे कच्चे थे
लेकिन रिश्ते सारे सच्चे थे...
चारपाई पर बैठते थे
पास पास रहते थे...
सोफे और डबल बेड आ गए
दूरियां हमारी बढा गए...
छतों पर अब न सोते हैं
बात बतंगड अब न होते हैं...
आंगन में वृक्ष थे
सांझे सुख दुख थे...
दरवाजा खुला रहता था
राही भी आ बैठता था...
कौवे भी कांवते थे
मेहमान आते जाते थे...
इक साइकिल ही पास था
फिर भी मेल जोल था...
रिश्ते निभाते थे
रूठते मनाते थे...
पैसा चाहे कम था
माथे पे ना गम था...
मकान चाहे कच्चे थे
रिश्ते सारे सच्चे थे...
अब शायद कुछ पा लिया है,
पर लगता है कि बहुत कुछ गंवा दिया...
जीवन की भाग-दौड़ में -
क्यूँ वक़्त के साथ रंगत खो जाती है?
हँसती-खेलती ज़िन्दगी भी,
आम हो जाती है।
एक सवेरा था,
जब हँस कर उठते थे हम...
और
आज कई बार,
बिना मुस्कुराये ही
शाम हो जाती है!!
कितने दूर निकल गए,
रिश्तो को निभाते निभाते...
खुद को खो दिया हमने,
अपनों को पाते पाते...
लेकिन रिश्ते सारे सच्चे थे...
चारपाई पर बैठते थे
पास पास रहते थे...
सोफे और डबल बेड आ गए
दूरियां हमारी बढा गए...
छतों पर अब न सोते हैं
बात बतंगड अब न होते हैं...
आंगन में वृक्ष थे
सांझे सुख दुख थे...
दरवाजा खुला रहता था
राही भी आ बैठता था...
कौवे भी कांवते थे
मेहमान आते जाते थे...
इक साइकिल ही पास था
फिर भी मेल जोल था...
रिश्ते निभाते थे
रूठते मनाते थे...
पैसा चाहे कम था
माथे पे ना गम था...
मकान चाहे कच्चे थे
रिश्ते सारे सच्चे थे...
अब शायद कुछ पा लिया है,
पर लगता है कि बहुत कुछ गंवा दिया...
जीवन की भाग-दौड़ में -
क्यूँ वक़्त के साथ रंगत खो जाती है?
हँसती-खेलती ज़िन्दगी भी,
आम हो जाती है।
एक सवेरा था,
जब हँस कर उठते थे हम...
और
आज कई बार,
बिना मुस्कुराये ही
शाम हो जाती है!!
कितने दूर निकल गए,
रिश्तो को निभाते निभाते...
खुद को खो दिया हमने,
अपनों को पाते पाते...
अंगारों से बच निकला हूँ फूलों से जला हूँ
इक रात में सौ बार जला और बुझा हूँ,
मुफ़लिस का दिया हूँ मगर आँधी से लड़ा हूँ.
जो कहना हो कहिए कि अभी जाग रहा हूँ,
सोऊँगा तो सो जाऊँगा दिन भर का थका हूँ.
सोऊँगा तो सो जाऊँगा दिन भर का थका हूँ.
कंदील समझ कर कोई सर काट न ले जाए,
ताजिर हूँ उजाले का अँधेरे में खड़ा हूँ.
ताजिर हूँ उजाले का अँधेरे में खड़ा हूँ.
सब एक नज़र फेंक के बढ़ जाते हैं आगे,
मैं वक़्त के शोकेस में चुपचाप खड़ा हूँ.
मैं वक़्त के शोकेस में चुपचाप खड़ा हूँ.
वो आईना हूँ जो कभी कमरे में सजा था,
अब गिर के जो टूटा हूँ तो रस्ते में पड़ा हूँ.
अब गिर के जो टूटा हूँ तो रस्ते में पड़ा हूँ.
दुनिया का कोई हादसा ख़ाली नहीं मुझसे,
मैं ख़ाक हूँ, मैं आग हूँ, पानी हूँ, हवा हूँ.
मैं ख़ाक हूँ, मैं आग हूँ, पानी हूँ, हवा हूँ.
मिल जाऊँगा दरिया में तो हो जाऊँगा दरिया,
सिर्फ़ इसलिए क़तरा हूँ ,मैं दरिया से जुदा हूँ.
सिर्फ़ इसलिए क़तरा हूँ ,मैं दरिया से जुदा हूँ.
हर दौर ने बख़्शी मुझे मेराजे मौहब्बत,
नेज़े पे चढ़ा हूँ कभी सूली पे चढ़ा हूँ.
नेज़े पे चढ़ा हूँ कभी सूली पे चढ़ा हूँ.
दुनिया से निराली है अपनी कहानी,
अंगारों से बच निकला हूँ फूलों से जला हूँ........................
अंगारों से बच निकला हूँ फूलों से जला हूँ........................
उनसे कहना, कि किस्मत पे इतना नाज़ ना करें,
हमने बारिश में भी, जलते हुए मकान देखें ह.....
Category: बेवफा शायरी
हमने बारिश में भी, जलते हुए मकान देखें ह.....
Category: बेवफा शायरी
सर झुकाने से नमाज़ें अदा नहीं होती...!!!
सर झुकाने से नमाज़ें अदा नहीं होती...!!!
दिल झुकाना पड़ता है इबादत के लिए...!!!
पहले मैं होशियार था,
इसलिए दुनिया बदलने चला था,
आज मैं समझदार हूँ,
इसलिए खुद को बदल रहा हूँ।।
बैठ जाता हूं मिट्टी पे अक्सर...
क्योंकि मुझे अपनी औकात अच्छी लगती है..
मैंने समंदर से सीखा है जीने का सलीक़ा,
चुपचाप से बहना और अपनी मौज में रहना ।।
ऐसा नहीं है कि मुझमें कोई ऐब नहीं है पर सच
कहता हूँ मुझमे कोई फरेब नहीं है
जल जाते हैं मेरे अंदाज़ से मेरे दुश्मन क्यूंकि एक
मुद्दत से मैंने
न मोहब्बत बदली और न दोस्त बदले .!
दिल झुकाना पड़ता है इबादत के लिए...!!!
पहले मैं होशियार था,
इसलिए दुनिया बदलने चला था,
आज मैं समझदार हूँ,
इसलिए खुद को बदल रहा हूँ।।
बैठ जाता हूं मिट्टी पे अक्सर...
क्योंकि मुझे अपनी औकात अच्छी लगती है..
मैंने समंदर से सीखा है जीने का सलीक़ा,
चुपचाप से बहना और अपनी मौज में रहना ।।
ऐसा नहीं है कि मुझमें कोई ऐब नहीं है पर सच
कहता हूँ मुझमे कोई फरेब नहीं है
जल जाते हैं मेरे अंदाज़ से मेरे दुश्मन क्यूंकि एक
मुद्दत से मैंने
न मोहब्बत बदली और न दोस्त बदले .!
रूठा अगर मैं तुझसे तो इस तरह से रूठुंगा,
कि तेरे शहर की मिट्टी भी मेरे वज़ूद को तरसेगी...
Category: मोहब्बत शायरी
कि तेरे शहर की मिट्टी भी मेरे वज़ूद को तरसेगी...
Category: मोहब्बत शायरी
कश्मीर के हालात पर एक कविता-----
ओ जन्नत के वाशिंदों,अब क्यों इतने लाचार हुए,
कहाँ तुम्हारी पत्थर ईंटे,कहाँ सभी हथियार हुए,
कहाँ गया जेहाद तुम्हारा,पाक परस्ती कहाँ गयी,
कहाँ गए वो चाँद सितारे,नूरा कुश्ती कहाँ गयी,
कहाँ गयी बाज़ार की बंदी,दीन के फतवे कहाँ गए,
केसर कहवा,सेब और अखरोटी रुतबे कहाँ गए,
पुन्य हिमालय की छाया में रहकर उसको गाली दी,
तुमने तब तब छेद किये है जब जब हमने थाली दी,
खूब जलाया ध्वजा तिरंगा,झंडा हरा उठाया था,
लाल चौक पर जब जी चाहा तब कोहराम मचाया था,
भारत के फौजी न तुमको फूटी आँख सुहाए थे,
नारे मुर्दाबाद हिन्द के तुमने रोज लगाए थे,
कुदरत कुछ नाराज़ हुयी तो,अल्ला अकबर भूल गए,
दाढ़ी टोपी तकरीरें,लाहौर पिशावर भूल गये,
अब क्यों चढ़े छतों पर घर की,क्यों झोली फैलाए हो,
जिन आँखों में नफरत थी क्यों उनमे आंसू लाये हो,
अरे मोमिनो,क्या अब भी आँखों पर पत्थर छाये है,
देखो,काफिर फौजी तुमको रोटी देने आये हैं,
Category: कविता
ओ जन्नत के वाशिंदों,अब क्यों इतने लाचार हुए,
कहाँ तुम्हारी पत्थर ईंटे,कहाँ सभी हथियार हुए,
कहाँ गया जेहाद तुम्हारा,पाक परस्ती कहाँ गयी,
कहाँ गए वो चाँद सितारे,नूरा कुश्ती कहाँ गयी,
कहाँ गयी बाज़ार की बंदी,दीन के फतवे कहाँ गए,
केसर कहवा,सेब और अखरोटी रुतबे कहाँ गए,
पुन्य हिमालय की छाया में रहकर उसको गाली दी,
तुमने तब तब छेद किये है जब जब हमने थाली दी,
खूब जलाया ध्वजा तिरंगा,झंडा हरा उठाया था,
लाल चौक पर जब जी चाहा तब कोहराम मचाया था,
भारत के फौजी न तुमको फूटी आँख सुहाए थे,
नारे मुर्दाबाद हिन्द के तुमने रोज लगाए थे,
कुदरत कुछ नाराज़ हुयी तो,अल्ला अकबर भूल गए,
दाढ़ी टोपी तकरीरें,लाहौर पिशावर भूल गये,
अब क्यों चढ़े छतों पर घर की,क्यों झोली फैलाए हो,
जिन आँखों में नफरत थी क्यों उनमे आंसू लाये हो,
अरे मोमिनो,क्या अब भी आँखों पर पत्थर छाये है,
देखो,काफिर फौजी तुमको रोटी देने आये हैं,
Category: कविता
इन्हीं रास्तों ने जिन पर मेरे साथ तुम चले थे,
मुझे रोक रोक पूछा तेरा हम-सफ़र कहाँ है?
Category: Dosti Shayari
मुझे रोक रोक पूछा तेरा हम-सफ़र कहाँ है?
Category: Dosti Shayari
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