अंगारों से बच निकला हूँ फूलों से जला हूँ


इक रात में सौ बार जला और बुझा हूँ,
मुफ़लिस का दिया हूँ मगर आँधी से लड़ा हूँ.
जो कहना हो कहिए कि अभी जाग रहा हूँ,
सोऊँगा तो सो जाऊँगा दिन भर का थका हूँ.
कंदील समझ कर कोई सर काट न ले जाए,
ताजिर हूँ उजाले का अँधेरे में खड़ा हूँ.
सब एक नज़र फेंक के बढ़ जाते हैं आगे,
मैं वक़्त के शोकेस में चुपचाप खड़ा हूँ.
वो आईना हूँ जो कभी कमरे में सजा था,
अब गिर के जो टूटा हूँ तो रस्ते में पड़ा हूँ.
दुनिया का कोई हादसा ख़ाली नहीं मुझसे,
मैं ख़ाक हूँ, मैं आग हूँ, पानी हूँ, हवा हूँ.
मिल जाऊँगा दरिया में तो हो जाऊँगा दरिया,
सिर्फ़ इसलिए क़तरा हूँ ,मैं दरिया से जुदा हूँ.
हर दौर ने बख़्शी मुझे मेराजे मौहब्बत,
नेज़े पे चढ़ा हूँ कभी सूली पे चढ़ा हूँ.
दुनिया से निराली है अपनी कहानी,
अंगारों से बच निकला हूँ फूलों से जला हूँ........................